पंचांग और ज्योतिष शब्दावली
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पंचांग के पाँच अंग
- पंचांगकिसी दिन का हिन्दू पंचांग: उसके पाँच अंग — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण — साथ में सूर्योदय, सूर्यास्त और दिन के शुभ-अशुभ काल।
- तिथिचान्द्र दिवस: चन्द्रमा को सूर्य से 12° आगे बढ़ने में लगने वाला समय। एक चान्द्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं, 15 शुक्ल पक्ष में और 15 कृष्ण पक्ष में।
- नक्षत्रतारों पर आधारित राशिचक्र के 27 बराबर भागों में से एक, हर एक 13°20′ का, अश्विनी से रेवती तक। दिन का नक्षत्र वह है जिसमें चन्द्रमा हो।
- योगसूर्य और चन्द्रमा के निरयण भोगांशों का योग, 13°20′ के 27 भागों में बँटा; 27 योग विष्कम्भ से वैधृति तक हैं।
- करणआधी तिथि। एक चान्द्र मास में 60 करण होते हैं: सात चर करण आठ बार दोहराए जाते हैं, और चार स्थिर करण (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) अमावस्या के आसपास आते हैं।
- वारसप्ताह का दिन, उसके ग्रह-स्वामी के नाम पर (रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि)। पंचांग में वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है।
चान्द्र कैलेंडर
- पक्षचान्द्र मास के दो भागों में से एक: शुक्ल पक्ष (बढ़ता चन्द्रमा, अमावस्या से पूर्णिमा) और कृष्ण पक्ष (घटता चन्द्रमा, पूर्णिमा से अमावस्या), हर एक में 15 तिथियाँ।
- अमावस्याअमावस्या तिथि, चान्द्र मास की 30वीं और अन्तिम तिथि (कृष्ण पक्ष 15), जब चन्द्रमा सूर्य की सीध में होता है और दिखाई नहीं देता।
- पूर्णिमापूर्णिमा तिथि, शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि, जब चन्द्रमा सूर्य के ठीक सामने होता है।
- एकादशीहर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, विष्णु के सम्मान में व्रत का दिन। वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं (अधिक मास हो तो 26), हर एक का अपना नाम।
- प्रदोष व्रतहर पक्ष की त्रयोदशी (13वीं तिथि) पर शिव का व्रत, जिसमें संध्या को पूजा होती है।
- अमान्तअमावस्या से अमावस्या तक गिना जाने वाला चान्द्र मास, जो महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दक्षिण-पश्चिम भारत के बड़े भाग में प्रचलित है।
- पूर्णिमान्तपूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिना जाने वाला चान्द्र मास, जो अधिकांश उत्तर भारत में प्रचलित है। इसमें पहले कृष्ण पक्ष आता है।
- मास (चान्द्र मास)चान्द्र मास: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
- अधिक मासलगभग हर दो-तीन वर्ष में जोड़ा जाने वाला अतिरिक्त चान्द्र मास, ताकि चान्द्र मास सौर वर्ष के साथ चलते रहें; इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं।
- क्षय मासबहुत दुर्लभ 'लुप्त' चान्द्र मास: वह चान्द्र मास जिसमें सूर्य दो राशियों में प्रवेश करे, जिससे एक मास का नाम छूट जाता है।
- क्षय तिथिवह तिथि जो एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाए, इसलिए पंचांग में किसी दिन का नाम उस पर नहीं होता।
- वृद्धि तिथिवह तिथि जो लगातार दो सूर्योदयों पर हो, इसलिए पंचांग में दो दिन उसी के नाम से होते हैं।
- उदया तिथिसूर्योदय के समय की तिथि, जिससे पंचांग में दिन का नाम होता है और बहुत से व्रत-त्योहार तय होते हैं।
- नक्षत्र पद (चरण)नक्षत्र का एक चौथाई भाग, 3°20′; 108 पद पूरे राशिचक्र को ढकते हैं और हर राशि में नौ पद होते हैं।
- संक्रान्तिसूर्य का नई निरयण राशि में प्रवेश; वर्ष में बारह संक्रान्तियाँ, जिनमें मकर और मेष संक्रान्ति सबसे प्रसिद्ध हैं।
- संवतसम्वत् वर्ष। उत्तर भारत में प्रायः विक्रम संवत् चलता है, और शक संवत् भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर संवत् है।
- संवत्सर60 वर्ष के चक्र में वर्ष का नाम (प्रभव, विभव, …), जो विशेषकर दक्षिण भारत में प्रचलित है।
- ऋतुदो-दो चान्द्र मास की छह ऋतुओं में से एक: वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर।
- अयनसूर्य का अर्ध-वर्ष: उत्तरायण (उत्तर की ओर गति) और दक्षिणायन (दक्षिण की ओर गति)।
मुहूर्त और दिन के काल
- मुहूर्तकिसी कार्य — विवाह, गृह प्रवेश, यात्रा या ख़रीद — के लिए पंचांग के अंगों और वर्जित कालों के आधार पर चुना गया शुभ समय। दिन या रात का 1/15 भाग भी मुहूर्त कहलाता है।
- घटीसमय की पारम्परिक इकाई: दिन-रात में 60 घटी होती हैं, यानी 24 घंटे के दिन में एक घटी 24 मिनट की।
- अभिजित मुहूर्तदोपहर का मुहूर्त, जो अधिकांश कार्य आरम्भ करने के लिए शुभ माना जाता है।
- ब्रह्म मुहूर्तभोर से पहले का मुहूर्त, जो प्रार्थना, ध्यान और अध्ययन के लिए श्रेष्ठ बताया गया है।
- विजय मुहूर्तदोपहर बाद का मुहूर्त, जिसे परम्परा से सफलता चाहने वाले कार्यों के लिए चुना जाता है।
- राहु कालहर दिन लगभग डेढ़ घंटे का राहु का काल, जिसमें परम्परा से नया कार्य आरम्भ नहीं किया जाता।
- यमगण्डयम का दैनिक काल, जिसे राहु काल की तरह टाला जाता है।
- गुलिक कालगुलिक (शनि पुत्र) का दैनिक काल; परम्परा के अनुसार इसमें शुरू किया गया कार्य दोहराया जाता है।
- दुर्मुहूर्तहर दिन के एक या दो अशुभ मुहूर्त, जो वार से तय होते हैं।
- वर्ज्यमहर नक्षत्र में लगभग डेढ़ घंटे का काल जिसे शुभ कार्यों में टाला जाता है (नक्षत्र त्याज्यम्)।
- अमृत कालहर नक्षत्र का एक शुभ काल, जिसे बहुत से पंचांग वर्ज्यम् के साथ देते हैं।
- चौघड़ियादिन के आठ और रात के आठ काल, जिनके नाम अमृत, शुभ, लाभ, चर, उद्वेग, काल या रोग हैं और जो शुभ या अशुभ माने जाते हैं; गुजरात और राजस्थान में समय चुनने के लिए बहुत प्रचलित।
- होराग्रह-होरा। दिन की 24 होराओं में हर एक का स्वामी एक ग्रह होता है, सूर्योदय पर वार-स्वामी से शुरू करके।
- भद्रा (विष्टि करण)विष्टि करण, सातवाँ चर करण, जिसे शुभ कार्यों में टाला जाता है; रक्षा बन्धन और होलिका दहन जैसे पर्वों का समय इसके बाहर रखा जाता है।
- पंचकवे चार-पाँच दिन जब चन्द्रमा धनिष्ठा (उत्तरार्ध) से रेवती तक चलता है, और जिनमें परम्परा से कुछ कार्य टाले जाते हैं।
- प्रदोष कालसूर्यास्त के बाद का संध्याकाल, शिव को प्रिय, जिससे प्रदोष व्रत, दीपावली की लक्ष्मी पूजा और दूसरे पर्वों की तिथि तय होती है।
- निशीथ कालआधी रात का मुहूर्त, जिससे जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि और काली पूजा की तिथि तय होती है।
- अपराह्नदोपहर बाद का समय, दिन के पाँच भागों में चौथा, जिससे दशहरा, रक्षा बन्धन और श्राद्ध की तिथि तय होती है।
आकाश और राशिचक्र
- अयनांशसायन राशिचक्र (वसन्त विषुव से नापा गया) और निरयण राशिचक्र (तारों से स्थिर) के बीच का कोण; आज लगभग 24°, जो अयन-चलन से धीरे-धीरे बढ़ता है।
- निरयण राशिचक्रस्थिर तारों से नापा गया राशिचक्र (निरयण), जो भारतीय ज्योतिष में प्रयुक्त होता है, विषुव से नापे गए सायन राशिचक्र के विपरीत।
- राशिराशिचक्र का 30° का एक भाग, मेष से मीन तक बारह में से एक। किसी व्यक्ति की राशि प्रायः जन्म के समय चन्द्रमा की राशि होती है।
- ग्रहज्योतिष के नौ ग्रह: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और चन्द्रपात राहु-केतु।
- वक्रीपृथ्वी से देखने पर उलटी (वक्री) चलता दिखता ग्रह। राहु और केतु सदा वक्री माने जाते हैं।
- अस्तसूर्य के इतना निकट ग्रह कि दिखाई न दे (अस्त), जिसे परम्परा से निर्बल माना जाता है; गुरु और शुक्र का अस्त विवाह मुहूर्त पर भी असर डालता है।
- ग्रहणसूर्य या चन्द्र ग्रहण, जिससे पहले सूतक का समय होता है जब बहुत से धार्मिक कार्य रोक दिए जाते हैं।
ज्योतिष (जन्म कुण्डली)
- लग्नकिसी क्षण और स्थान पर पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि। यह औसतन लगभग हर दो घंटे में बदलती है और जन्म कुण्डली का पहला भाव है।
- भावजन्म कुण्डली का भाव; बारह भाव जीवन के क्षेत्रों को दर्शाते हैं और लग्न से गिने जाते हैं।
- कुण्डलीजन्म कुण्डली: जन्म के क्षण और स्थान पर बारह राशियों और भावों में नौ ग्रहों की स्थिति।
- नवमांश (D9)नौवाँ वर्ग चार्ट (D9): हर राशि को 3°20′ के नौ भागों में बाँटा जाता है। इसे जन्म कुण्डली के साथ, विशेषकर विवाह के लिए, देखा जाता है।
- विंशोत्तरी दशाविंशोत्तरी दशा: ग्रह-कालों का 120 वर्ष का क्रम (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 वर्ष), जो ज्योतिष में समय-निर्धारण के लिए प्रयुक्त होता है।
- गोचरराशियों में ग्रहों का वर्तमान भ्रमण (गोचर), जिसे जन्म कुण्डली के सापेक्ष — प्रायः चन्द्र राशि से — देखा जाता है।
- साढ़े सातीलगभग साढ़े सात वर्ष का वह समय जब शनि जन्म की चन्द्र राशि से पहले की, उसी की और उसके बाद की राशि में गोचर करता है।
- शनि ढैयालगभग ढाई वर्ष का वह समय जब शनि जन्म के चन्द्रमा से चौथी या आठवीं राशि में गोचर करता है (कण्टक शनि)।
- मांगलिक दोषजन्म कुण्डली के कुछ भावों में मंगल, जिसे परम्परा से विवाह से पहले देखा जाता है। परिभाषाएँ परम्पराओं में अलग-अलग हैं।
- काल सर्प दोषऐसी कुण्डली जिसमें सातों ग्रह राहु-केतु अक्ष के एक ही ओर हों।
- पितृ दोषपूर्वजों से जुड़ी पीड़ा के रूप में पढ़ी जाने वाली पारम्परिक स्थिति; इसकी परिभाषा बहुत भिन्न है।
- गण्डमूल नक्षत्रजल और अग्नि राशियों की सन्धि पर स्थित छह नक्षत्रों में से किसी में चन्द्रमा होने पर जन्म, जिसके लिए परम्परा से शान्ति-पूजा की जाती है।
- अष्टकवर्गशुभ बिन्दुओं की पद्धति, जो हर ग्रह और लग्न राशियों को देते हैं; इससे गोचर और राशियों का बल देखा जाता है।
कुण्डली मिलान
- गुण मिलान (अष्टकूट)वर और कन्या के चन्द्र नक्षत्र और राशि से निकलने वाला 36 गुणों का पारम्परिक मिलान (अष्टकूट)।
- नाड़ी दोषदोनों के चन्द्र नक्षत्र एक ही नाड़ी (आदि, मध्य या अन्त्य) में, जिससे गुण मिलान में 8 में से 0 गुण मिलते हैं।
- भकूट दोषदोनों चन्द्र राशियाँ 2/12, 5/9 या 6/8 के सम्बन्ध में, जिससे गुण मिलान में 7 में से 0 गुण मिलते हैं।
- गण दोषदोनों चन्द्र नक्षत्रों से गणों (देव, मनुष्य, राक्षस) का असंगत जोड़ा।