विंशोत्तरी ज्योतिष की सबसे प्रचलित दशा पद्धति है। इसमें 120 वर्षों की अवधि को नौ महादशाओं में बाँटा जाता है, जिनमें से प्रत्येक का स्वामी एक ग्रह होता है। दशा-क्रम का आरम्भ जन्म के समय चन्द्रमा के नक्षत्र से होता है। "विंशोत्तरी" शब्द का अर्थ ही है — एक सौ बीस।

नौ महादशाएँ और उनकी अवधि

महादशाएँ सदा एक ही क्रम में आती हैं और इनका योग ठीक 120 वर्ष होता है:

  1. केतु – 7 वर्ष
  2. शुक्र – 20 वर्ष
  3. सूर्य – 6 वर्ष
  4. चन्द्र – 10 वर्ष
  5. मंगल – 7 वर्ष
  6. राहु – 18 वर्ष
  7. गुरु – 16 वर्ष
  8. शनि – 19 वर्ष
  9. बुध – 17 वर्ष

बुध के बाद चक्र फिर केतु से शुरू होता है।

दशा कहाँ से आरम्भ होती है

27 नक्षत्रों को इसी नौ-क्रम में दशा-स्वामी दिए गए हैं, जो तीन बार दोहराया जाता है: अश्विनी → केतु, भरणी → शुक्र, कृत्तिका → सूर्य, रोहिणी → चन्द्र, इत्यादि; इस तरह मघा और मूल का स्वामी फिर केतु होता है। जन्म-नक्षत्र का स्वामी पहली महादशा का स्वामी बनता है।

जन्म प्रायः नक्षत्र के ठीक आरम्भ में नहीं होता। चन्द्रमा नक्षत्र का कुछ भाग पार कर चुका होता है, इसलिए पहली दशा का केवल शेष भाग बचता है। इसे जन्म के समय दशा-शेष (भोग्य दशा) कहते हैं, और यह अनुपात से निकलता है: यदि चन्द्रमा नक्षत्र का 40% पार कर चुका है, तो पहले दशा-स्वामी के वर्षों का 60% शेष रहेगा। उदाहरण के लिए, रोहिणी के 40% पर चन्द्रमा हो तो चन्द्र की 10 वर्षीय महादशा के 6 वर्ष शेष रहेंगे। इसके बाद अगली महादशाएँ क्रम से चलती हैं।

अन्तर्दशा और सूक्ष्म स्तर

हर महादशा नौ अन्तर्दशाओं में बँटती है, जो उसी महादशा-स्वामी से शुरू होकर उसी क्रम में चलती हैं। अवधि अनुपातिक होती है: अन्तर्दशा = महादशा के वर्ष × अन्तर्दशा-स्वामी के वर्ष ÷ 120। प्रत्यन्तर्दशा इसी सूत्र से अन्तर्दशा को फिर बाँटती है।

वर्ष की लम्बाई और सटीकता

दशा-शेष चन्द्रमा की सटीक स्थिति पर निर्भर है, इसलिए जन्म-समय या अयनांश में छोटा अन्तर भी तिथियों को कुछ सप्ताह या महीने आगे-पीछे कर सकता है। वर्ष की लम्बाई पर भी मत भिन्न हैं: इस प्लेटफ़ॉर्म की गणना-प्रोफ़ाइल 365.25 दिन का वर्ष लेती है, जबकि कुछ परम्पराएँ 360 दिन (सावन) का वर्ष मानती हैं, जिससे जीवन भर में तिथियाँ काफ़ी खिसक जाती हैं। क्षेत्र और परम्परा के अनुसार मान्यताएँ भिन्न हो सकती हैं।

दशा को संतुलित दृष्टि से देखें

दशा-फल जीवन के विभिन्न चरणों को समझने का एक पारम्परिक ढाँचा है, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। इसे सामान्यतः पूरी कुण्डली के साथ मिलाकर पढ़ा जाता है।

अपनी महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा की पूरी समय-रेखा कुण्डली टूल में देखें; गणना-पद्धति कार्यप्रणाली पृष्ठ पर उपलब्ध है।