जब एक ही दिन अपराह्न में दो तिथियाँ हों, तो दोनों श्राद्ध उसी दिन होते हैं; जब कोई तिथि क्षय हो, तो उसका श्राद्ध पास की तिथि के साथ एक ही दिन पड़ता है।
श्राद्ध का दिन कैसे चुना जाता है
पितर का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर किया जाता है। श्राद्ध का दिन वह है जिस दिन वह तिथि अपराह्न (दिनमान के पाँच बराबर भागों में चौथा भाग) में व्याप्त हो; यदि दो दिन अपराह्न को स्पर्श करे तो अधिक व्याप्ति वाला दिन लिया जाता है।
कुतुप मुहूर्त दिन के पन्द्रह मुहूर्तों में आठवाँ और रौहिण मुहूर्त नौवाँ है; इनके बाद अपराह्न काल आता है। श्राद्ध कर्म प्रायः कुतुप या रौहिण में आरम्भ कर अपराह्न समाप्त होने से पहले पूरे किए जाते हैं।
चतुर्दशी श्राद्ध पारम्परिक रूप से उन पितरों के लिए है जिनकी मृत्यु शस्त्र, दुर्घटना या अन्य अकाल कारण से हुई हो। जिनका स्वाभाविक देहान्त चतुर्दशी को हुआ हो, उनका श्राद्ध प्रायः सर्व पितृ अमावस्या को किया जाता है।
सर्व पितृ अमावस्या (महालया) सभी पितरों के लिए है, उनके लिए भी जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है।
परम्पराएँ क्षेत्र और पंचांग पद्धति के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। समय चयनित स्थान, समय क्षेत्र और गणना प्रोफ़ाइल के अनुसार दिखाए गए हैं।
अन्य हिन्दू पंचांग सूचियाँ
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