पूरे भारत में दीपावली (लक्ष्मी पूजा)
दीपावली दीपों का पाँच दिन का पर्व है। इसकी मुख्य रात आश्विन (अमान्त) की अमावस्या है — वही रात जिसे पूर्णिमान्त पंचांग कार्तिक अमावस्या कहते हैं — पर उस रात क्या मनाया जाता है, यह क्षेत्र के अनुसार बदलता है।
तिथि कैसे तय होती है
दीपावली की अमावस्या अमान्त पंचांगों में आश्विन और पूर्णिमान्त पंचांगों में कार्तिक कहलाती है, इसलिए एक ही रात के लिए दोनों नाम सही हैं। लक्ष्मी पूजा उस दिन होती है जब प्रदोष (संध्या) में अमावस्या हो; काली पूजा उस दिन जब आधी रात को अमावस्या हो, जो कभी-कभी एक दिन पहले पड़ती है।
ये वही नियम हैं जो इस साइट का इंजन अपनाता है; तिथियाँ चुने गए स्थान की हैं।
धनतेरस (धनत्रयोदशी) — 06/11/2026 (शुक्र)
- अमान्त पद्धति (मास अमावस्या पर समाप्त) में यह आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी है; उत्तर भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित पूर्णिमान्त पद्धति (मास पूर्णिमा पर समाप्त) में यही दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी कहलाता है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन प्रदोष काल में यह तिथि व्याप्त हो — सूर्यास्त के बाद रात्रि का पहला पंचमांश।
- यदि तिथि लगातार दो दिन उस काल में व्याप्त हो तो जिस दिन वह उस काल के अधिक भाग में रहे, वह दिन लिया जाता है।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — 08/11/2026 (रवि)
- अमान्त पद्धति (मास अमावस्या पर समाप्त) में यह आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी है; उत्तर भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित पूर्णिमान्त पद्धति (मास पूर्णिमा पर समाप्त) में यही दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी कहलाता है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन अरुणोदय में यह तिथि व्याप्त हो — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट (4 घटी)।
- यदि तिथि लगातार दो दिन उस काल में व्याप्त हो तो पहला दिन लिया जाता है।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) — 08/11/2026 (रवि)
- अमान्त पद्धति (मास अमावस्या पर समाप्त) में यह आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या है; उत्तर भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित पूर्णिमान्त पद्धति (मास पूर्णिमा पर समाप्त) में यही दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या कहलाता है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन प्रदोष काल में यह तिथि व्याप्त हो — सूर्यास्त के बाद रात्रि का पहला पंचमांश।
- यदि तिथि लगातार दो दिन उस काल में व्याप्त हो तो दूसरा दिन तभी लिया जाता है जब उसमें तिथि कम से कम 24 मिनट रहे; अन्यथा पहला दिन लिया जाता है।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
अमावस्या दो संध्याओं में प्रदोष व्याप्त हो तो दूसरी संध्या तभी ली जाती है जब उसमें अमावस्या कम से कम एक घटी (24 मिनट) रहे। शास्त्रीय मत भिन्न हैं; क्षेत्रीय पंचांग देखें।
काली पूजा — 08/11/2026 (रवि)
- अमान्त पद्धति (मास अमावस्या पर समाप्त) में यह आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या है; उत्तर भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित पूर्णिमान्त पद्धति (मास पूर्णिमा पर समाप्त) में यही दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या कहलाता है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन निशीथ काल में यह तिथि व्याप्त हो — रात्रि के पन्द्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय मध्यरात्रि के आसपास।
- यदि तिथि लगातार दो दिन उस काल में व्याप्त हो तो जिस दिन वह उस काल के अधिक भाग में रहे, वह दिन लिया जाता है।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा — 09/11/2026 (सोम)
- तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा है; अमान्त और पूर्णिमान्त दोनों पद्धतियों में मास का नाम एक ही है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन स्थानीय सूर्योदय के समय यह तिथि व्याप्त हो (उदया तिथि)।
- सूर्योदय तभी माना जाता है जब उसके बाद तिथि कम से कम 3 मुहूर्त (प्रत्येक दिनमान का पन्द्रहवाँ भाग) रहे; इससे कम हो तो पिछला दिन लिया जाता है, जिसमें तिथि आरम्भ होती है।
- यदि तिथि दो सूर्योदयों पर हो (वृद्धि तिथि) तो पहला दिन लिया जाता है।
- जब तिथि दो दिन दिनमान के कम से कम तीन मुहूर्त (पंचमांश) तक रहे, तो पहला दिन, जो पिछली तिथि से युक्त है, लिया जाता है (इस पर्व का अपना नियम)।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- दर्शाया गया पूजा समय: दिन के इन कालों में से पहला, जिसमें तिथि व्याप्त हो: प्रातःकाल, सायंकाल।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
जब अमावस्या दीपावली के अगले दिन तक रहे और प्रतिपदा उसी दिन आरम्भ हो (जैसे 9 नवम्बर 2026, प्रतिपदा 12:31 IST से), तब यह नियम वही अमावस्या-युक्त दिन रखता है, जैसा भारत सरकार की सूची में है, और पूजा सायंकाल में दर्शाता है। सूर्योदय (प्रातःकाल) में प्रतिपदा माँगने वाले पंचांग, और सूर्योदय की प्रतिपदा वाला दिन रखने वाला इस्कॉन (GCal) कैलेंडर, अगला दिन लेते हैं (10 नवम्बर 2026)।
भाई दूज — 11/11/2026 (बुध)
- तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया है; अमान्त और पूर्णिमान्त दोनों पद्धतियों में मास का नाम एक ही है।
- यह उस दिन होता है जिस दिन अपराह्न में यह तिथि व्याप्त हो — दिनमान का चौथा पंचमांश, दोपहर बाद।
- यदि तिथि लगातार दो दिन उस काल में व्याप्त हो तो जिस दिन वह उस काल के अधिक भाग में रहे, वह दिन लिया जाता है।
- यदि तिथि किसी भी दिन उस काल को स्पर्श न करे (क्षय तिथि), तो जिस हिन्दू दिन में तिथि सबसे अधिक समय रहे, वह दिन लिया जाता है।
- जिस वर्ष उसी नाम का अधिक मास हो, उस वर्ष यह शुद्ध (निज) मास में मनाया जाता है।
क्षेत्र-दर-क्षेत्र
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दीपावली (लक्ष्मी पूजा)
उत्तर भारत
घरों को दीपों की पंक्तियों से सजाया जाता है; यह रात राम के अयोध्या लौटने की याद दिलाती है, और समृद्धि के लिए लक्ष्मी की पूजा होती है।
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काली पूजा
पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश
दीपावली की अमावस्या पर बंगाल के हिन्दू लक्ष्मी के स्थान पर देवी काली की पूजा करते हैं, बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में।
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दीपावली (नरक चतुर्दशी)
तमिल और तेलुगु क्षेत्र
दीपावली उस दिन के रूप में मनाई जाती है जब कृष्ण ने असुर राजा नरकासुर को हराया था — अज्ञान और बुराई पर ज्ञान और अच्छाई की विजय।
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दीपावली और नववर्ष
गुजरात
दीपावली वर्ष का समापन करती है: उसका अगला दिन गुजराती नववर्ष (बेसतु वरस) है, जिससे गुजरात में विक्रम संवत का वर्ष शुरू होता है।
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बंदी छोड़ दिवस
पंजाब (सिख)
सिख इसी रात को बंदी छोड़ दिवस मनाते हैं, जब गुरु हरगोबिन्द ग्वालियर के किले की क़ैद से मुक्त हुए थे।
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परिवारों, समुदायों और स्थानों के रीति-रिवाज़ अलग-अलग होते हैं; यह मार्गदर्शिका वही बताती है जो उद्धृत स्रोतों में लिखा है, कोई एक सही विधि नहीं।