कथा
चम्पक नगर में राजा वैखानस राज्य करते थे, जहाँ विद्वानों का सम्मान होता था और प्रजा सुखी थी। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके स्वर्गीय पिता नरक में कष्ट भोग रहे हैं और पुत्र से उद्धार की पुकार कर रहे हैं।
राजा अत्यन्त व्याकुल होकर जागे। सुबह उन्होंने पुरोहितों को स्वप्न बताया, जिन्होंने भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता पर्वत मुनि के पास जाने की सलाह दी।
पर्वत मुनि ने ध्यान करके कहा, “तुम्हारे पिता ने अपने जीवन में एक पवित्र अवसर पर अपनी एक पत्नी की उपेक्षा कर उसे कष्ट दिया था। उसी का फल वे भोग रहे हैं। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य उन्हें अर्पित करो।”
वैखानस ने लौटकर परिवार सहित पूजा और दान के साथ व्रत किया और उसका पुण्य पिता को समर्पित किया। देवताओं ने पुष्पवर्षा की, और मुक्त हुए पिता ने स्वर्ग जाते हुए पुत्र को आशीर्वाद दिया।
मान्यता है कि इसी तिथि पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था, इसलिए यह दिन गीता जयन्ती भी है और बहुत से लोग व्रत के साथ गीता का पाठ करते हैं।
पारम्परिक कथा को हमने अपने शब्दों में कहा है; परिवारों और पुस्तिकाओं में कही जाने वाली कथाओं के विवरण में अन्तर होता है।